एक दिन एक चींटी को निचे गिरा हुआ पत्ता मिला। पत्ता किस काम में आएगा उसे नहीं पता था। यह पता लगाने क लिए भी उसके पास बोधशक्ति का अभाव था। फिर भी उसने उस पत्ते को लादकर अपने घर के ओर प्रस्थान किया। पत्ते का आकर चींटी के अकार से कई गुना बड़ा था। पत्ते को उठाकर ले जाने में उसे काफी मेहनत लग रही थी। रास्ते में न जाने कितने ही रुकावटें भी आ रही थी। पर उन रुकावटों का सामना करते हुए बड़ी निपुणता क साथ चींटी अपने घर पहुंची। पत्ते को उसने घर के अंदर ले जाने की बहुत कोशिश की पर द्वार छोटा था और इस वजह से वो उसे घर के बाहर ही छोड़ गई। इसका मतलब यह की वह एक ऐसे व्यर्थ से वास्तु को लाद के इतनी मेहनत की जो उसके किसी काम न आई और अंत में उसे उस पत्ते को छोड़ना पड़ा। इंसान का जीवन भी काफी इस चिंटी के जीवन से मिलता जुलता है। हम अपने और परिवार के लिए व्यस्त हैं। अर्थ यानि पैसों के आभाव में हमें लगता है की हमारी स्तिथि कमज़ोर हो रही है। हम में से कई इतने हैं जिन्हे पैसे कामना ही जीवन का मूल मंत्र लगता है। असफलता हमे घेरने लगता है। हम गलत रास्तों का प्रयोग कर सफल होने का प्रयास करते हैं पर आखिर में क्या होता है? अंत समय में वही कमाया हुआ अर्थ किसी काम नहीं आता। सब छोड़ के अकेले जाना पड़ता है।
Source- page-2; epaper Sambad; Dt- April 29,2020.![]() |
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